राधा स्वामी जी

हम में से हर किसी के पास अपनी जिन्दगी है लेकिन फिर भी कुछ लोग होते है जो असल मायने में इसे जीते है या यूँ कहूँ एक संजीदा जिन्दगी जो दूसरों के लिए भी खुशियों के मायने बने ऐसी जिन्दगी जी पाना बहुत मुश्किल होता है क्योकि हम लगातार चीजों को ignore मारते चले जाते है जबकि ये एक सत्य है कि जितना हम दूसरो के लिए बेहतर बन पाते है उतना ही हम अपने लिए भी बेहतर होते है क्योकि जिन्दगी में हम उतना ही पाते है जितना किसी दूसरे को देने में हम समर्थ होते है | एक कहानी के जरिये आप इसे समझ सकते है |

” एक दिन एक बच्चा अपनी माँ से नाराज हो जाता है तो जब उसे डांट दिया जाता है तो गुस्सा होकर वो घर से बाहर चला जाता है और घर से थोड़ी दूर एक पहाड़ी पर जाकर जोर से चिल्ला कर बार बार कहता है कि ” मैं तुमसे नफरत करता हूँ ” तो थोड़ी ही देर बाद उसे अपनी ही प्रतिध्वनी सुनाई देती है तो वो बच्चा जिसे नहीं पता कि ये आवाज क्यों आती है उसे लगता है कि उस तरफ भी कोई है जो उस से यही कह रहा है तो वो डर जाता है वापिस अपनी माँ के पास आकर पूरी बात बताता है तो उसकी माँ समझ जाती है और बच्चे को वापिस उसी पहाड़ी पर लेजाकर कहती है अब तुम ये कहो कि ” मैं तुमसे प्यार करता हूँ ” तो वो फिर वही आवाज गूंजी तो उसकी माँ ने कहा कि देखो तुमने जब ये कहा कि ” मैं तुमसे नफरत करता हूँ” तो सामने से भी तुम्हे यही सुनने को मिला लेकिन जन्हा तुमने अपनी नफरत को प्यार में बदल दिया वन्ही सामने वाले का नजरिया भी तुम्हारे लिए बदल गया | तो बच्चे को एक बड़ी सीख इस घटना से मिली |

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