राधा स्वामी जी

अफलातून ने मरते समय अपने बच्चो को बुलाया और कहा ‘मैं तुम्हे चार रत्न ( Jems of life ) देना चाहता हूँ |’ आशा करता हूँ तुम इन्हें सभाल कर रखोगे | इन रत्नों के इस्तेमाल से अपना जीवन सुखी बनाओगे | बच्चो ने बेसब्री से इस बारे में पूछा तो अफलातून ने उन्हें समझाया |

पहला रत्न मैं तुम्हे क्षमा का देता हूँ कोई तुम्हे कुछ भी कहे उस से द्वेष मत रखो तुम उसे भूलते रहो क्योंकि प्रतिकार का विचार ही वो है जो मनुष्य के स्वाभाव में क्रोध को जन्म देता है | क्रोध मनुष्य को अँधा बना देता है और क्रोध के वशीभूत होकर मनुष्य कुछ भी अच्छा या बुरा विचार नहीं कर पाता इसी वजह से उसे जिन्दगी में परेशानियों का सामना करना पड़ता है |क्रोध को त्याग कर अपने अपने स्वाभाव में रहना है |

दूसरा रत्न उसने अपने बच्चो को ये समझाया कि जितना हो सके अहंकार से दूर रहो और अपने द्वारा किये जाने वाले उपकार को भूल जाना चाहिए | इस संसार में सभी जीव एक दुसरे पर निर्भर है इसलिए बिना परस्पर सहयोग के कोई भी मनुष्य अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता है | और न ही किसी का काम बिना किसी के काम आये या बिना किसी के सहयोग से चल सकता है इसलिए जितना संभव हो सके अहंकार से हमे दूर रहना |

तीसरा रत्न है विश्वाश | यह बात अपने हृदय में अंकित रखना कि इश्वर पर भरोसा करने से बेहतर यदि तुम अपने आप पर और एक दुसरे पर भरोसा रखना चाहिए | एक दुसरे में विश्वास की कमी ही रिश्तो को कमजोर कर देती है |

अंत में उसके कहा सबसे महत्वपूर्ण रत्न जो है वो है वैराग्य का क्योंकि हमेशा याद रखो की तुम्हे अंतत: इस दुनिया से जाना ही है तो अपनी सम्पूर्णता के साथ जीवन जीना | हमेशा जीवन का उज्जावल पक्ष देखना इस से तुम्हारी सारी समस्याएं अपने आप आसान हो जाएँगी |

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