राधा स्वामी जी

महाराज जी ने एक दिन सत्संग में बड़े महाराज जी के सम्बन्ध में एक घटना सुनाई जिसको सुनना हमारे लिए एक नया अनुभव था । एक दिन बड़े महाराज जी ने महाराज जी को और उनके भाई (शोती )को बुलाया और उनसे एक सवाल पूंछा ,” तुम क्या बनना चाहोगे -पूत ,कपूत,या सपूत ?”

महाराज जी ने जवाब दिया कि वह सवाल पूरी तरह समझ नहीं पाये है। सो बड़े महाराज जे ने समझाया कि “पूत” वह लड़का होता है जो अपने पिता से मिली हुई जमीन ,जायदाद और खानदान की मान -प्रतिष्ठा को संभाल कर वैसी की वैसी रखता है,न उसको बढ़ाता है न बर्बाद करता है । “कपूत” वह है जो पिता से उत्तराधिकार से मिला हुआ सब कुछ बर्बाद केर देता है,गवां देता है ; और “सपूत ” वह है जो पिता से प्राप्त हुई दौलत को बढ़ाता है,अपने पिता तथा परिवार के नाम के साथ और मान प्रतिष्ठा को और ऊँचा उठाता है ,उसमें चार चाँद लगाता है ।

बड़े महाराज जी ने यह कहकर फिर पूछा ,”तुम क्या बनना चाहोगे ?” महाराज जी के भाई तो चुप रहे,परन्तु महाराज जी ने जवाब दिया ,”हज़ूर ,मै तो सपूत ही बनना चाहूंगा ,पर सबकुछ आपके हाथ में है ।”

बड़े मालिक जी ने फ़रमाया ,”मालिक तुम्हे सपूत बनाएगा ।”

आज हम देख सकते है कि महाराज जी बड़े महाराज जी के उत्तम सपूत ही सिद्ध हुए है । न केवल सांसारिक दौलत हज़ार गुना बड़ी है । बल्कि रूहानी दौलत का भी असीम विस्तार हुआ है । महाराज जी की निस्वार्थ सेवा और समर्पण के फल स्वरुप हज़ूर बड़े महाराज जी के उपदेश आज संसार के कोने कोने में फैल गए है ।

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